पूर्णा ने जरा भौहें चढ़ा कर कहा - 'बहन, तुम कैसी बातें करती हो? एक तो ब्राह्मणी, दूसरे विधवा, फिर नाते से बहन, मुझे वह क्या कुदृष्टि से देखेंगे? फिर उनका कभी ऐसा स्वभाव नहीं रहा।'
पूर्णा - 'तो आज क्यों नहीं बीमार पड़ जातीं।'
पूर्णा - 'बड़ी निर्दयी हो बहन, आज चली जाना, तुम्हें मेरी कसम।'
दस-बारह दिन बीत गए थे। एक दिन आधी रात के बाद पूर्णा को सुमित्रा के कमरे का द्वार खुलने की आहट मिली। उसने समझा, शायद कमलाप्रसाद
पूर्णा ने जरा भौहें चढ़ा कर कहा - 'बहन, तुम कैसी बातें करती हो? एक तो ब्राह्मणी, दूसरे विधवा, फिर नाते से बहन, मुझे वह क्या कुदृष्टि से देखेंगे? फिर उनका कभी ऐसा स्वभाव नहीं रहा।'
पूर्णा - 'तो आज क्यों नहीं बीमार पड़ जातीं।'
पूर्णा - 'बड़ी निर्दयी हो बहन, आज चली जाना, तुम्हें मेरी कसम।'
दस-बारह दिन बीत गए थे। एक दिन आधी रात के बाद पूर्णा को सुमित्रा के कमरे का द्वार खुलने की आहट मिली। उसने समझा, शायद कमलाप्रसाद