प्रतिज्ञा - Pratigya



कमलाप्रसाद ने विस्मित हो कर कहा - 'मनाने आई थीं, सुमित्रा? झूठी बात। मुझे कोई मनाने नहीं आया था। मनाने ही क्यों लगी। जिससे प्रेम होता है, उसे मनाया जाता है। मैं तो मर भी जाऊँ, तो किसी को रंज न हो। हाँ, माँ-बाप रो लेंगे। सुमित्रा मुझे क्यों मनाने लगी। क्या तुमसे कहती थी?'

कमलाप्रसाद ने मानो यह बात नहीं सुनी। समीप आ कर बोले - 'यहाँ कब तक खड़ी रहोगी। अंदर आओ, तुमसे कुछ कहना है।'

कमलाप्रसाद उसकी घबराहट देख कर पलंग पर


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कमलाप्रसाद ने विस्मित हो कर कहा - 'मनाने आई थीं, सुमित्रा? झूठी बात। मुझे कोई मनाने नहीं आया था। मनाने ही क्यों लगी। जिससे प्रेम होता है, उसे मनाया जाता है। मैं तो मर भी जाऊँ, तो किसी को रंज न हो। हाँ, माँ-बाप रो लेंगे। सुमित्रा मुझे क्यों मनाने लगी। क्या तुमसे कहती थी?'

कमलाप्रसाद ने मानो यह बात नहीं सुनी। समीप आ कर बोले - 'यहाँ कब तक खड़ी रहोगी। अंदर आओ, तुमसे कुछ कहना है।'

कमलाप्रसाद उसकी घबराहट देख कर पलंग पर


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