खलिहान में विचरा करती थी। विवाह भी ऐसे पुरुष से हुआ, जो जवान हो कर भी बालक था, जो इतना लज्जाशील था कि यदि मुहल्ले की कोई स्त्री घर आ जाती, तो अंदर कदम न रखता। वह अपने कमरे से निकली और मर्दाने कमरे के द्वार पर जा कर धीरे से किवाड़ पर थपकी दी। भय तो उसे यह था कि कमलाप्रसाद की नींद मुश्किल से टूटेगी, लेकिन वहाँ नींद कहाँ? आहट पाते ही कमलाप्रसाद ने द्वार खोल दिया और पूर्णा को देखकर कौतूहल से बोला - 'क्या है पूर्णा, आओ बैठो।'
खलिहान में विचरा करती थी। विवाह भी ऐसे पुरुष से हुआ, जो जवान हो कर भी बालक था, जो इतना लज्जाशील था कि यदि मुहल्ले की कोई स्त्री घर आ जाती, तो अंदर कदम न रखता। वह अपने कमरे से निकली और मर्दाने कमरे के द्वार पर जा कर धीरे से किवाड़ पर थपकी दी। भय तो उसे यह था कि कमलाप्रसाद की नींद मुश्किल से टूटेगी, लेकिन वहाँ नींद कहाँ? आहट पाते ही कमलाप्रसाद ने द्वार खोल दिया और पूर्णा को देखकर कौतूहल से बोला - 'क्या है पूर्णा, आओ बैठो।'