प्रतिज्ञा - Pratigya

प्रेम-सुख की कल्पना करना ही पाप समझा जाता है, लेकिन सोचो तो समाज का यह कितना बड़ा अन्याय है। क्या ईश्वर ने तुम्हें इसीलिए बनाया है कि दो-तीन साल प्रेम का सुख भोगने के बाद आजीवन वैधव्य की कठोर यातना सहती रहो। कभी नहीं, ईश्वर इतना अन्यायी, इतना क्रूर नहीं हो सकता। वसंत कुमार जी मेरे परम मित्र थे। आज भी उनकी याद आती है, तो आँखों में आँसू भर जाते हैं। इस समय भी मैं उन्हें अपने सामने खड़ा रखता हूँ तुमसे उन्हें बहुत प्रेम था। तुम्हारे सिर में जरा भी पीड़ा होती थी,


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प्रेम-सुख की कल्पना करना ही पाप समझा जाता है, लेकिन सोचो तो समाज का यह कितना बड़ा अन्याय है। क्या ईश्वर ने तुम्हें इसीलिए बनाया है कि दो-तीन साल प्रेम का सुख भोगने के बाद आजीवन वैधव्य की कठोर यातना सहती रहो। कभी नहीं, ईश्वर इतना अन्यायी, इतना क्रूर नहीं हो सकता। वसंत कुमार जी मेरे परम मित्र थे। आज भी उनकी याद आती है, तो आँखों में आँसू भर जाते हैं। इस समय भी मैं उन्हें अपने सामने खड़ा रखता हूँ तुमसे उन्हें बहुत प्रेम था। तुम्हारे सिर में जरा भी पीड़ा होती थी,


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