प्रतिज्ञा - Pratigya

तो बेचारे विकल हो जाते थे। वह तुम्हें सुख में मढ़ देना चाहते थे, चाहते थे कि तुम्हें हवा का झोंका भी न लगे। उन्होंने अपना जीवन ही तुम्हारे लिए अर्पण कर दिया था। रोओ मत पूर्णा, तुम्हें जरा उदास देख कर उनका कलेजा फट जाता था, तुम्हें रोते देख कर उनकी आत्मा को कितना दुःख होगा, फिर यह आज कोई नई बात नहीं। इधर महीनों से तुम्हें रोने के सिवा दूसरा काम नहीं है और निर्दयी समाज चाहता है कि तुम जीवन पर्यंत यों ही रोती रहो, तुम्हारे मुख पर हास्य की एक रेखा भी न दिखाई दे,


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तो बेचारे विकल हो जाते थे। वह तुम्हें सुख में मढ़ देना चाहते थे, चाहते थे कि तुम्हें हवा का झोंका भी न लगे। उन्होंने अपना जीवन ही तुम्हारे लिए अर्पण कर दिया था। रोओ मत पूर्णा, तुम्हें जरा उदास देख कर उनका कलेजा फट जाता था, तुम्हें रोते देख कर उनकी आत्मा को कितना दुःख होगा, फिर यह आज कोई नई बात नहीं। इधर महीनों से तुम्हें रोने के सिवा दूसरा काम नहीं है और निर्दयी समाज चाहता है कि तुम जीवन पर्यंत यों ही रोती रहो, तुम्हारे मुख पर हास्य की एक रेखा भी न दिखाई दे,


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