प्रतिज्ञा - Pratigya

बैठ कर देखना चाहते थे - एक बार उसके मनोभावों की थाह लेना चाहते थे, लेकिन यह भी चाहते थे कि वह यह न समझे कि उसकी परीक्षा हो रही है। कहीं उसने भाँप लिया तो अनर्थ हो जाएगा, उसका कोमल हृदय उस परीक्षा का भार सह भी सकेगा या नहीं।

आखिर उन्होंने एक दिन कह ही डाला - 'आजकल, आईने में अपनी सूरत देखते हो?'

अमृतराय - 'कोई अंतर है?'

अमृतराय - 'झूठ न बोलो यार, मुझे तो याद ही नहीं आता कि तुम इतने तैयार कभी थे। सच कहता हूँ, मैं तुम्हें


148 of 305

बैठ कर देखना चाहते थे - एक बार उसके मनोभावों की थाह लेना चाहते थे, लेकिन यह भी चाहते थे कि वह यह न समझे कि उसकी परीक्षा हो रही है। कहीं उसने भाँप लिया तो अनर्थ हो जाएगा, उसका कोमल हृदय उस परीक्षा का भार सह भी सकेगा या नहीं।

आखिर उन्होंने एक दिन कह ही डाला - 'आजकल, आईने में अपनी सूरत देखते हो?'

अमृतराय - 'कोई अंतर है?'

अमृतराय - 'झूठ न बोलो यार, मुझे तो याद ही नहीं आता कि तुम इतने तैयार कभी थे। सच कहता हूँ, मैं तुम्हें


148 of 305