दाननाथ - 'पहाड़ पर जाने में रुपए लगते हैं, यहाँ कौड़ी कफन को भी नहीं है।'
दाननाथ - 'तुम्हारे पास भी तो रुपए नहीं हैं, ईंट-पत्थर में उड़ा दिए।'
दाननाथ - 'खूब उन रूपयों से आप पहाड़ों की हवा खाइएगा। अपने घर की जमा लुटा कर अब दूसरों के सामने हाथ फैलाते फिरोगे?'
दाननाथ - 'जी, तो मुझे क्षमा कीजिए, आप ही पहाड़ों की सैर कीजिए। तुमने व्यर्थ इतने रुपए नष्ट कर दिए। सौ-पचास अनाथों को तुमने आश्रय दे ही दिया, तो कौन बड़ा उपकार हुआ जाता है। हाँ,
दाननाथ - 'पहाड़ पर जाने में रुपए लगते हैं, यहाँ कौड़ी कफन को भी नहीं है।'
दाननाथ - 'तुम्हारे पास भी तो रुपए नहीं हैं, ईंट-पत्थर में उड़ा दिए।'
दाननाथ - 'खूब उन रूपयों से आप पहाड़ों की हवा खाइएगा। अपने घर की जमा लुटा कर अब दूसरों के सामने हाथ फैलाते फिरोगे?'
दाननाथ - 'जी, तो मुझे क्षमा कीजिए, आप ही पहाड़ों की सैर कीजिए। तुमने व्यर्थ इतने रुपए नष्ट कर दिए। सौ-पचास अनाथों को तुमने आश्रय दे ही दिया, तो कौन बड़ा उपकार हुआ जाता है। हाँ,