प्रतिज्ञा - Pratigya

तुम्हारी लीडरी की अभिलाषा पूरी हो जाएगी।'

दाननाथ को 'उपकार' शब्द से घृणा थी। 'सेवा' को भी वह इतना ही घृणित समझते थे। उन्हें सेवा और उपकार के परदे में केवल अहंकार और ख्याति-प्रेम छिपा हुआ मालूम होता था। अमृतराय ने कुछ उत्तर न दिया। दाननाथ कोई उत्तर सुनने को तैयार भी न थे, उन्हें घर जाने की जल्दी थी, अतएव उन्होंने भी उठ कर हाथ बढ़ा दिया। दाननाथ ने हाथ मिलाया और विदा हो गए।

घर पहुँचे, तो प्रेमा ने पूछा - 'आज बड़ी देर लगाई,


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तुम्हारी लीडरी की अभिलाषा पूरी हो जाएगी।'

दाननाथ को 'उपकार' शब्द से घृणा थी। 'सेवा' को भी वह इतना ही घृणित समझते थे। उन्हें सेवा और उपकार के परदे में केवल अहंकार और ख्याति-प्रेम छिपा हुआ मालूम होता था। अमृतराय ने कुछ उत्तर न दिया। दाननाथ कोई उत्तर सुनने को तैयार भी न थे, उन्हें घर जाने की जल्दी थी, अतएव उन्होंने भी उठ कर हाथ बढ़ा दिया। दाननाथ ने हाथ मिलाया और विदा हो गए।

घर पहुँचे, तो प्रेमा ने पूछा - 'आज बड़ी देर लगाई,


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