प्रतिज्ञा - Pratigya

न सुन लें। इशारे से महरी को बुलाया और पानदान मँगवा कर पान बनाने लगी।

अमृतराय ने उन्हें गले लगाते हुए कहा - 'आज तो यार तुमने कमाल कर दिखाया मैंने अपनी जिंदगी में कभी ऐसी स्पीच न सुनी थी।'

अमृतराय - 'दिल्लगी नहीं थी भाई, जादू था। तुमने तो आग लगा दी। अब भला हम जैसों की कौन सुनेगा। मगर सच बताना यार, तुम्हें यह विभूति कैसे हाथ आ गई? मैं तो दाँत पीस रहा था। मौका होता वहीं तुम्हारी मरम्मत करता।'

अमृतराय- 'सबसे पीछे की तरफ,


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न सुन लें। इशारे से महरी को बुलाया और पानदान मँगवा कर पान बनाने लगी।

अमृतराय ने उन्हें गले लगाते हुए कहा - 'आज तो यार तुमने कमाल कर दिखाया मैंने अपनी जिंदगी में कभी ऐसी स्पीच न सुनी थी।'

अमृतराय - 'दिल्लगी नहीं थी भाई, जादू था। तुमने तो आग लगा दी। अब भला हम जैसों की कौन सुनेगा। मगर सच बताना यार, तुम्हें यह विभूति कैसे हाथ आ गई? मैं तो दाँत पीस रहा था। मौका होता वहीं तुम्हारी मरम्मत करता।'

अमृतराय- 'सबसे पीछे की तरफ,


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