प्रतिज्ञा - Pratigya

मैं मुँह छिपाए खड़ा था। आओ, जरा तुम्हारी पीठ ठोंक दूँ?'

अमृतराय - 'अब तुम मेरे हाथों पिटोगे। तुमने पहली ही स्पीच में अपनी धाक जमा दी, आगे चल कर तो तुम्हारा जवाब ही न मिलेगा। मुझे दुःख है तो यही कि हम और तुम अब दो प्रतिकूल मार्ग पर चलते नजर आएँगे। मगर यार यहाँ दूसरा कोई नहीं है, क्या तुम दिल से समझते हो कि सुधारों से हिंदू-समाज को हानि पहुँचेगी?'

अमृतराय - 'तो फिर हमारी और तुम्हारी खूब छनेगी, मगर एक बात का ध्यान रखना,


164 of 305

मैं मुँह छिपाए खड़ा था। आओ, जरा तुम्हारी पीठ ठोंक दूँ?'

अमृतराय - 'अब तुम मेरे हाथों पिटोगे। तुमने पहली ही स्पीच में अपनी धाक जमा दी, आगे चल कर तो तुम्हारा जवाब ही न मिलेगा। मुझे दुःख है तो यही कि हम और तुम अब दो प्रतिकूल मार्ग पर चलते नजर आएँगे। मगर यार यहाँ दूसरा कोई नहीं है, क्या तुम दिल से समझते हो कि सुधारों से हिंदू-समाज को हानि पहुँचेगी?'

अमृतराय - 'तो फिर हमारी और तुम्हारी खूब छनेगी, मगर एक बात का ध्यान रखना,


164 of 305