प्रतिज्ञा - Pratigya

हमारे सामाजिक सिद्धांतों में चाहे कितना ही भेद क्यों न हो, मंच पर चाहे एक-दूसरे को नोच ही क्यों न खाएँ मगर मैत्री अक्षुण्ण रहनी चाहिए। हमारे निज के संबंध पर उनकी आँच तक न आने पाए। मुझे अपने ऊपर तो विश्वास है, लेकिन तुम्हारे ऊपर मुझे विश्वास नहीं है। क्षमा करना, मुझे भय है कि तुम...'

अमृतराय ने संदिग्ध भाव से कहा - 'तुम कहते हो, मगर मुझे विश्वास नहीं आता।'

अमृतराय - 'और तो घर में सब कुशल है न? अम्माँ जी से मेरा प्रणाम कह देना।'


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हमारे सामाजिक सिद्धांतों में चाहे कितना ही भेद क्यों न हो, मंच पर चाहे एक-दूसरे को नोच ही क्यों न खाएँ मगर मैत्री अक्षुण्ण रहनी चाहिए। हमारे निज के संबंध पर उनकी आँच तक न आने पाए। मुझे अपने ऊपर तो विश्वास है, लेकिन तुम्हारे ऊपर मुझे विश्वास नहीं है। क्षमा करना, मुझे भय है कि तुम...'

अमृतराय ने संदिग्ध भाव से कहा - 'तुम कहते हो, मगर मुझे विश्वास नहीं आता।'

अमृतराय - 'और तो घर में सब कुशल है न? अम्माँ जी से मेरा प्रणाम कह देना।'


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