ही क्यों उस पर यों निर्दय प्रहार कर रही है। उसे फिर भ्रम हुआ कि कहीं सुमित्रा ने रात की बात जान तो नहीं ली। वह भीत और आहत हो कर दबी जबान से बोली - 'बहन, तुम्हारे मन में जो बात हो, वह साफ-साफ कह दो। मुझ अनाथ को जला कर क्या पाओगी? अगर मेरा यहाँ रहना तुम्हें बुरा लगता है तो मैं आज ही मुँह में कालिख लगा कर यहाँ से चली जाऊँगी। संसार में लाखों विधवाएँ पड़ी हैं, क्या सभी के रक्षक बैठे हैं? किसी भाँति उनके दिन भी कटते ही हैं।
ही क्यों उस पर यों निर्दय प्रहार कर रही है। उसे फिर भ्रम हुआ कि कहीं सुमित्रा ने रात की बात जान तो नहीं ली। वह भीत और आहत हो कर दबी जबान से बोली - 'बहन, तुम्हारे मन में जो बात हो, वह साफ-साफ कह दो। मुझ अनाथ को जला कर क्या पाओगी? अगर मेरा यहाँ रहना तुम्हें बुरा लगता है तो मैं आज ही मुँह में कालिख लगा कर यहाँ से चली जाऊँगी। संसार में लाखों विधवाएँ पड़ी हैं, क्या सभी के रक्षक बैठे हैं? किसी भाँति उनके दिन भी कटते ही हैं।