प्रतिज्ञा - Pratigya

मुझ पर नाहक बिगड़ती हो।'

पूर्णा को यह अंतिम वाक्य बाण के समान लगा। वह हक्की-बक्की हो कर सुमित्रा का मुँह ताकने लगी। यद्यपि वह सदैव सुमित्रा की ठकुरसुहाती किया करती थी, फिर भी वह यह जानती थी कि जिस दिन कमलाप्रसाद साड़ियाँ लाए थे, उसी दिन से सुमित्रा उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगी है, किंतु उस अवसर पर पूर्णा ने कमलाप्रसाद का उपहार वापस करके अपनी समझ में संदेह को मिटा देने का सफल प्रयत्न किया था। फिर आज सुमित्रा अकारण


205 of 305

मुझ पर नाहक बिगड़ती हो।'

पूर्णा को यह अंतिम वाक्य बाण के समान लगा। वह हक्की-बक्की हो कर सुमित्रा का मुँह ताकने लगी। यद्यपि वह सदैव सुमित्रा की ठकुरसुहाती किया करती थी, फिर भी वह यह जानती थी कि जिस दिन कमलाप्रसाद साड़ियाँ लाए थे, उसी दिन से सुमित्रा उसे संदेह की दृष्टि से देखने लगी है, किंतु उस अवसर पर पूर्णा ने कमलाप्रसाद का उपहार वापस करके अपनी समझ में संदेह को मिटा देने का सफल प्रयत्न किया था। फिर आज सुमित्रा अकारण


205 of 305