उसने अपना वाक्य समाप्त तो कर दिया, पर मुख की चेष्टा से ज्ञात होता था कि वह और कुछ कहना चाहती है, लेकिन किसी कारणवश नहीं कह रही है।
सुमित्रा - 'तो जाती कहाँ हो, जरा बैठो तो।'
पूर्णा इधर अपने कमरे में आ कर रोने लगी। उधर सुमित्रा ने हारमोनियम पर गाना शुरू किया -
यह गाना था या पूर्णा पर विजय पाने का आह्लाद! पूर्णा को तो यह विजय-गान-सा प्रतीत हुआ। एक-एक स्वर उसके हृदय पर एक-एक शर के समान चोट कर रहा था। क्या अब इस घर
उसने अपना वाक्य समाप्त तो कर दिया, पर मुख की चेष्टा से ज्ञात होता था कि वह और कुछ कहना चाहती है, लेकिन किसी कारणवश नहीं कह रही है।
सुमित्रा - 'तो जाती कहाँ हो, जरा बैठो तो।'
पूर्णा इधर अपने कमरे में आ कर रोने लगी। उधर सुमित्रा ने हारमोनियम पर गाना शुरू किया -
यह गाना था या पूर्णा पर विजय पाने का आह्लाद! पूर्णा को तो यह विजय-गान-सा प्रतीत हुआ। एक-एक स्वर उसके हृदय पर एक-एक शर के समान चोट कर रहा था। क्या अब इस घर