प्रतिज्ञा - Pratigya

में उसका निर्वाह हो सकता है? असंभव! न जाने वह कौन-सी मनहूस घड़ी थी, जब वह इस घर में आई? अपने उस झोंपड़े में रह कर सिलाई करके या चक्की पीस कर क्या वह जीवन व्यतीत न कर सकती थी? बेचारी बिल्लो अंत तक उसे समझाती रही, पर भाग्य में तो धक्के खाने लिखे थे, उसकी बात कैसे मानती?

पूर्णा रात ही से एकांत में रात के समय कमलाप्रसाद के पास जाने पर पछता रही थी। उन भले आदमी को भी उस समय चुहल करने की सूझ गई। मगर वह साड़ी मुझ पर खूब खिल रही थी। मुझे वहाँ जाना ही न चाहिए था,


209 of 305

में उसका निर्वाह हो सकता है? असंभव! न जाने वह कौन-सी मनहूस घड़ी थी, जब वह इस घर में आई? अपने उस झोंपड़े में रह कर सिलाई करके या चक्की पीस कर क्या वह जीवन व्यतीत न कर सकती थी? बेचारी बिल्लो अंत तक उसे समझाती रही, पर भाग्य में तो धक्के खाने लिखे थे, उसकी बात कैसे मानती?

पूर्णा रात ही से एकांत में रात के समय कमलाप्रसाद के पास जाने पर पछता रही थी। उन भले आदमी को भी उस समय चुहल करने की सूझ गई। मगर वह साड़ी मुझ पर खूब खिल रही थी। मुझे वहाँ जाना ही न चाहिए था,


209 of 305