प्रतिज्ञा - Pratigya

फिर तो कोई बात भी न पूछेगा। विधवा को कुलटा बनते कितनी देर लगती है।

पूर्णा ने द्वार पर खड़े-खड़े कहा - 'मेरे वहाँ आने का कोई काम नहीं है। मैं केवल आपसे विदा माँगने आई हूँ। इस घर में अब मेरा निर्वाह नहीं हो सकता। आखिर मैं भी तो आदमी हूँ। कहाँ तक सबका मुँह ताकूँ और किस-किस की खुशामद करूँ?'

पूर्णा - 'मेरे अंदर आने की जरूरत नहीं। यों ही ताने मिल रहे हैं, फिर तो न जाने क्या कलंक लग जाएगा।'

पूर्णा - 'किसी ने दिया हो, आपका


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फिर तो कोई बात भी न पूछेगा। विधवा को कुलटा बनते कितनी देर लगती है।

पूर्णा ने द्वार पर खड़े-खड़े कहा - 'मेरे वहाँ आने का कोई काम नहीं है। मैं केवल आपसे विदा माँगने आई हूँ। इस घर में अब मेरा निर्वाह नहीं हो सकता। आखिर मैं भी तो आदमी हूँ। कहाँ तक सबका मुँह ताकूँ और किस-किस की खुशामद करूँ?'

पूर्णा - 'मेरे अंदर आने की जरूरत नहीं। यों ही ताने मिल रहे हैं, फिर तो न जाने क्या कलंक लग जाएगा।'

पूर्णा - 'किसी ने दिया हो, आपका


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