प्रतिज्ञा - Pratigya

पर एक बार और उनसे मिलना होगा। मैं द्वार पर खड़ी रहूँगी, मुझे कमरे में जाने की जरूरत ही क्या है? खड़े-खड़े कह दूँगी - बाबू जी, अब मुझे आप जाने दीजिए और कहीं जगह नहीं है तो बाबू अमृतराय का विधवाश्रम तो है। दस-पाँच विधवाएँ वहाँ रहती भी तो हैं। मैं भी वहीं चली जाऊँ, तो क्या हर्ज है? वह समझाएँगे तो बहुत, सुमित्रा को डाँटने पर भी तैयार हो जाएँगे, पर इस डाँट-डपट से और भी झमेला बढ़ेगा, तरह-तरह के संदेह लोगों के मन में पैदा होंगे। अभी कम-से-कम लोगों को मुझ पर दया आती है,


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पर एक बार और उनसे मिलना होगा। मैं द्वार पर खड़ी रहूँगी, मुझे कमरे में जाने की जरूरत ही क्या है? खड़े-खड़े कह दूँगी - बाबू जी, अब मुझे आप जाने दीजिए और कहीं जगह नहीं है तो बाबू अमृतराय का विधवाश्रम तो है। दस-पाँच विधवाएँ वहाँ रहती भी तो हैं। मैं भी वहीं चली जाऊँ, तो क्या हर्ज है? वह समझाएँगे तो बहुत, सुमित्रा को डाँटने पर भी तैयार हो जाएँगे, पर इस डाँट-डपट से और भी झमेला बढ़ेगा, तरह-तरह के संदेह लोगों के मन में पैदा होंगे। अभी कम-से-कम लोगों को मुझ पर दया आती है,


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