बाबूजी। मेरा प्राण भी आप लोगों के काम आए तो मुझे उसको देने में आनंद मिलेगा, लेकिन बात बढ़ती जाती है और आगे चल कर न जाने और कितनी बढ़ें इसलिए मेरा यहाँ से जाना ही अच्छा है।'
पूर्णा द्वार से चिपकी हुई बोली - 'पहले द्वार खोल दो तो मैं बताऊँ। क्यों व्यर्थ मेरा जीवन नष्ट कर रहे हो।'
पूर्णा का निष्कपट हृदय इस प्रेम-दर्शन से घोर असमंजस में पड़ गया। उसका एक हाथ किवाड़ की चटखनी पर था, वह आप-ही-आप चटखनी के पास से हट गया। वह
बाबूजी। मेरा प्राण भी आप लोगों के काम आए तो मुझे उसको देने में आनंद मिलेगा, लेकिन बात बढ़ती जाती है और आगे चल कर न जाने और कितनी बढ़ें इसलिए मेरा यहाँ से जाना ही अच्छा है।'
पूर्णा द्वार से चिपकी हुई बोली - 'पहले द्वार खोल दो तो मैं बताऊँ। क्यों व्यर्थ मेरा जीवन नष्ट कर रहे हो।'
पूर्णा का निष्कपट हृदय इस प्रेम-दर्शन से घोर असमंजस में पड़ गया। उसका एक हाथ किवाड़ की चटखनी पर था, वह आप-ही-आप चटखनी के पास से हट गया। वह