प्रतिज्ञा - Pratigya



कमलाप्रसाद ने सिर ठोक कर कहा - 'हाय, फिर वही बात। अच्छी बात है। जाओ, एक बार भी बैठने को न कहूँगा।'

कमलाप्रसाद ने कहा - 'अब जाती क्यों नहीं हो? मैंने तुम्हें बाँध तो नहीं लिया है।'

कमलाप्रसाद ने उदासीन भाव से कहा - 'तुम्हें मेरे प्राणों की रक्षा की क्या परवाह जिस तरह तुम्हारे ऊपर मेरा कुछ जोर नहीं है, उसी तरह मेरे ऊपर भी तुम्हारा कोई जोर नहीं है। या तुम्हें भूल ही जाऊँगा, या प्राणों का अंत ही करूँगा, मगर इससे तुम्हारा क्या बनता-बिगड़ता है। जी में आए,


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कमलाप्रसाद ने सिर ठोक कर कहा - 'हाय, फिर वही बात। अच्छी बात है। जाओ, एक बार भी बैठने को न कहूँगा।'

कमलाप्रसाद ने कहा - 'अब जाती क्यों नहीं हो? मैंने तुम्हें बाँध तो नहीं लिया है।'

कमलाप्रसाद ने उदासीन भाव से कहा - 'तुम्हें मेरे प्राणों की रक्षा की क्या परवाह जिस तरह तुम्हारे ऊपर मेरा कुछ जोर नहीं है, उसी तरह मेरे ऊपर भी तुम्हारा कोई जोर नहीं है। या तुम्हें भूल ही जाऊँगा, या प्राणों का अंत ही करूँगा, मगर इससे तुम्हारा क्या बनता-बिगड़ता है। जी में आए,


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