दिया। पूर्णा की छाती धक-धक कर रही थी। कमलाप्रसाद कहीं कोई नटखटी न कर बैठे। मगर कमलाप्रसाद इतना बेशउर न था कि समीप आते हुए शिकार को दूर से ही चौंका देता। उसने पान खिला दिया और चारपाई पर बैठ कर बोला - 'अब यहाँ से कहीं जाने का नाम मत लेना। सारा जमाना छूट जाए, पर तुम मुझसे नहीं छूट सकती। जीवन-भर के लिए यही घर तुम्हारा घर है और मैं तुम्हारा दास हूँ। जिस दिन तुमने यहाँ से जाने का नाम लिया, उसी दिन मैंने किसी तरफ का रास्ता लिया।'
दिया। पूर्णा की छाती धक-धक कर रही थी। कमलाप्रसाद कहीं कोई नटखटी न कर बैठे। मगर कमलाप्रसाद इतना बेशउर न था कि समीप आते हुए शिकार को दूर से ही चौंका देता। उसने पान खिला दिया और चारपाई पर बैठ कर बोला - 'अब यहाँ से कहीं जाने का नाम मत लेना। सारा जमाना छूट जाए, पर तुम मुझसे नहीं छूट सकती। जीवन-भर के लिए यही घर तुम्हारा घर है और मैं तुम्हारा दास हूँ। जिस दिन तुमने यहाँ से जाने का नाम लिया, उसी दिन मैंने किसी तरफ का रास्ता लिया।'