प्रतिज्ञा - Pratigya

मगर जब किसी अबला के जीवन पर दैवी आघात हो जाता है, तो उससे आशा की जाती है कि वह सदैव उसके नाम को रोती रहे। यह कितना बड़ा अन्याय है। पुरूषों ने यह विधान, केवल अपनी काम-वासना को तृप्त करने के लिए किया है। बस, इसका और कोई अर्थ नहीं। जिसने यह व्यवस्था की, वह चाहे देवता हो या ऋर्षि अथवा महात्मा, मैं उसे मानव समाज का सबसे बड़ा शत्रु समझता हूँ। स्त्रियों के लिए पतिव्रत-धर्म की पख लगा दी। पुनः संस्कार होता, तो इतनी अनाथ स्त्रियाँ उसके पंजे में कैसे फँसतीं। बस,


228 of 305

मगर जब किसी अबला के जीवन पर दैवी आघात हो जाता है, तो उससे आशा की जाती है कि वह सदैव उसके नाम को रोती रहे। यह कितना बड़ा अन्याय है। पुरूषों ने यह विधान, केवल अपनी काम-वासना को तृप्त करने के लिए किया है। बस, इसका और कोई अर्थ नहीं। जिसने यह व्यवस्था की, वह चाहे देवता हो या ऋर्षि अथवा महात्मा, मैं उसे मानव समाज का सबसे बड़ा शत्रु समझता हूँ। स्त्रियों के लिए पतिव्रत-धर्म की पख लगा दी। पुनः संस्कार होता, तो इतनी अनाथ स्त्रियाँ उसके पंजे में कैसे फँसतीं। बस,


228 of 305