ठान लिया है कि लाला के मुख में कालिख पोत दूँगी। बला से मेरी आबरू जाए, बला से सर्वनाश हो जाए, मगर इन्हें कहीं मुँह दिखाने लायक न रखूँगी।'
सुमित्रा - 'तुम्हारे डूब मरने से मेरा क्या उपकार होगा? न वह अपना स्वभाव छोड़ सकते हैं, न मैं अपना स्वभाव छोड़ सकती हूँ। न वह पैसों को दाँत से पकड़ना छोडेंगे और न मैं पैसों को तुच्छ समझना छोड़ूँगी। उन्हें छिछोरेपन से प्रेम है, अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने का खब्त। मुझे इन बातों से घृणा
ठान लिया है कि लाला के मुख में कालिख पोत दूँगी। बला से मेरी आबरू जाए, बला से सर्वनाश हो जाए, मगर इन्हें कहीं मुँह दिखाने लायक न रखूँगी।'
सुमित्रा - 'तुम्हारे डूब मरने से मेरा क्या उपकार होगा? न वह अपना स्वभाव छोड़ सकते हैं, न मैं अपना स्वभाव छोड़ सकती हूँ। न वह पैसों को दाँत से पकड़ना छोडेंगे और न मैं पैसों को तुच्छ समझना छोड़ूँगी। उन्हें छिछोरेपन से प्रेम है, अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने का खब्त। मुझे इन बातों से घृणा