प्रतिज्ञा - Pratigya

जी चाहा लिया, जी चाहा न लिया। प्रेम एक बीज है, जो एक बार जम कर फिर बड़ी मुश्किल से उखड़ता है। कभी-कभी तो जल, प्रकाश और वायु बिना ही जीवन पर्यंत जीवित रहता है। प्रेमा केवल तुम्हारी मँगेतर नहीं है, वह तुम्हारी प्रेमिका भी है। यह सूचना उसे मिलेगी तो उसका हृदय भग्न हो जाएगा। कह नहीं सकता, उसकी क्या दशा हो जाए। तुम उस पर घोर अन्याय कर रहे हो।'

बोले - 'अगर वह उतनी ही सहृदय है, जितना मैं समझता हूँ, तो मेरी प्रतिज्ञा पर उसे


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जी चाहा लिया, जी चाहा न लिया। प्रेम एक बीज है, जो एक बार जम कर फिर बड़ी मुश्किल से उखड़ता है। कभी-कभी तो जल, प्रकाश और वायु बिना ही जीवन पर्यंत जीवित रहता है। प्रेमा केवल तुम्हारी मँगेतर नहीं है, वह तुम्हारी प्रेमिका भी है। यह सूचना उसे मिलेगी तो उसका हृदय भग्न हो जाएगा। कह नहीं सकता, उसकी क्या दशा हो जाए। तुम उस पर घोर अन्याय कर रहे हो।'

बोले - 'अगर वह उतनी ही सहृदय है, जितना मैं समझता हूँ, तो मेरी प्रतिज्ञा पर उसे


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