प्रतिज्ञा - Pratigya



दाननाथ सरल स्वभाव के मनुष्य थे। जीवन के सरलतम मार्ग पर चलने ही में वह संतुष्ट थे। किसी सिद्धांत या आदर्श के लिए कष्ट सहना उन्होंने न सीखा था। वह एक कॉलेज में अध्यापक थे। दस बजे कॉलेज जाते। एक बजे लौट आते। बाकी सारा दिन सैर-सपाटे और हँसी-खेल में काट देते थे।

दाननाथ यह लंबा व्याख्यान सुन कर बोले - 'तो तुमने निश्चय कर लिया?'

दाननाथ - 'और प्रेमा?'

दाननाथ ने तिरस्कार-भाव से कहा - 'क्या बातें करते हो। तुम समझते हो, प्रेमा कोई बाजार का सौदा है,


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दाननाथ सरल स्वभाव के मनुष्य थे। जीवन के सरलतम मार्ग पर चलने ही में वह संतुष्ट थे। किसी सिद्धांत या आदर्श के लिए कष्ट सहना उन्होंने न सीखा था। वह एक कॉलेज में अध्यापक थे। दस बजे कॉलेज जाते। एक बजे लौट आते। बाकी सारा दिन सैर-सपाटे और हँसी-खेल में काट देते थे।

दाननाथ यह लंबा व्याख्यान सुन कर बोले - 'तो तुमने निश्चय कर लिया?'

दाननाथ - 'और प्रेमा?'

दाननाथ ने तिरस्कार-भाव से कहा - 'क्या बातें करते हो। तुम समझते हो, प्रेमा कोई बाजार का सौदा है,


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