स्वयं नहीं कह सकती कि प्रेम की मीठी बातों में पड़ कर क्या कर बैठती। यह मामला बड़ा नाजुक है बहन? धन से आदमी का जी भर जाए, प्रेम से तृप्ति नहीं होती। ऐसे कान बहुत कम हैं, जो प्रेम के शब्द सुन कर फूल न उठें।'
पूर्णा ने हिचकते हुए कहा - 'आप जाएँ, मैं किसी वक्त चली जाऊँगी।'
पूर्णा ने फिर सुमित्रा की ओर देखा, पर सुमित्रा अभी तक दीवार की ओर ताक रही थी। न 'हाँ' कहते बनता था न 'नहीं'। प्रेमा से वह इधर महीनों से न मिल सकी थी।
स्वयं नहीं कह सकती कि प्रेम की मीठी बातों में पड़ कर क्या कर बैठती। यह मामला बड़ा नाजुक है बहन? धन से आदमी का जी भर जाए, प्रेम से तृप्ति नहीं होती। ऐसे कान बहुत कम हैं, जो प्रेम के शब्द सुन कर फूल न उठें।'
पूर्णा ने हिचकते हुए कहा - 'आप जाएँ, मैं किसी वक्त चली जाऊँगी।'
पूर्णा ने फिर सुमित्रा की ओर देखा, पर सुमित्रा अभी तक दीवार की ओर ताक रही थी। न 'हाँ' कहते बनता था न 'नहीं'। प्रेमा से वह इधर महीनों से न मिल सकी थी।