प्रतिज्ञा - Pratigya

को पूर्णा के चले जाने ही में अपना उद्धार दिखाई दिया।'

कुछ दूर तक ताँगा परिचित मार्ग से चला। वही मंदिर थे, वही दूकानें थी। पूर्णा की शंका दूर होने लगी, लेकिन एक मोड़ पर ताँगे को घूमते देख कर पूर्णा को ऐसा आभास हुआ कि सीधा रास्ता छूटा जा रहा है। उसने कमलाप्रसाद से पूछा - 'इधर से कहाँ चल रहे हो?'

पूर्णा ने घबरा कर पूछा - 'यह तुम मुझे कहाँ लिए चलते हो?'

'तुमने बगीचे का तो जिक्र भी नहीं किया था, नहीं तो मैं कभी नहीं आती।'


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को पूर्णा के चले जाने ही में अपना उद्धार दिखाई दिया।'

कुछ दूर तक ताँगा परिचित मार्ग से चला। वही मंदिर थे, वही दूकानें थी। पूर्णा की शंका दूर होने लगी, लेकिन एक मोड़ पर ताँगे को घूमते देख कर पूर्णा को ऐसा आभास हुआ कि सीधा रास्ता छूटा जा रहा है। उसने कमलाप्रसाद से पूछा - 'इधर से कहाँ चल रहे हो?'

पूर्णा ने घबरा कर पूछा - 'यह तुम मुझे कहाँ लिए चलते हो?'

'तुमने बगीचे का तो जिक्र भी नहीं किया था, नहीं तो मैं कभी नहीं आती।'


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