प्रतिज्ञा - Pratigya

ग्रीष्म के मेघों का भीषण प्रवाह था। इसमें शरद ऋतु के निर्मल जल-प्रवाह का कोमल संगीत नहीं, पावस की प्रलयंकारी बाढ़ का भयंकर नाद था। पूर्णा सहम उठी। झपट कर कोच से उठी, कमलाप्रसाद का हाथ झटके से खींचा और द्वार खोल कर बरामदे में निकल आई।

पूर्णा ने निर्भय हो कर कहा - 'मैं घर जाऊँगी? ताँगा कहाँ है?'

'ताँगा लाओ, मैं जाऊँगी।'

'कुछ हुआ नहीं मैं यहाँ एक क्षण भर भी नहीं रहना चाहती'

'तुम मुझे रोक नहीं सकते?'

'तो मैं, चिल्ला कर शोर मचाऊँगी।'


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ग्रीष्म के मेघों का भीषण प्रवाह था। इसमें शरद ऋतु के निर्मल जल-प्रवाह का कोमल संगीत नहीं, पावस की प्रलयंकारी बाढ़ का भयंकर नाद था। पूर्णा सहम उठी। झपट कर कोच से उठी, कमलाप्रसाद का हाथ झटके से खींचा और द्वार खोल कर बरामदे में निकल आई।

पूर्णा ने निर्भय हो कर कहा - 'मैं घर जाऊँगी? ताँगा कहाँ है?'

'ताँगा लाओ, मैं जाऊँगी।'

'कुछ हुआ नहीं मैं यहाँ एक क्षण भर भी नहीं रहना चाहती'

'तुम मुझे रोक नहीं सकते?'

'तो मैं, चिल्ला कर शोर मचाऊँगी।'


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