प्रतिज्ञा - Pratigya

भाई साहब कि बस, कुछ न पूछिए। वहाँ न कोई आदमी न आदमजात; किसे पुकारता? जब मैं बेहोश गिर पड़ा तो तीनों वहाँ से खिसक गए।'

'भाई साहब, आदमी के भीतर क्या है, इसे ब्रह्मा भी नहीं जान सकते; हमारी-आपकी हस्ती भी क्या है। साधुओं के भेष में बहुधा दुष्ट........।'

दाननाथ ने दबी जबान से पूछा - 'भाई साहब का खयाल है कि अमृतराय......'

दाननाथ ने देखा कि अब स्पष्ट कहने के सिवाय और मार्ग नहीं है, चाहे कमलाप्रसाद नाराज ही क्यों न हो जाए। सिर नीचा करके एक अप्रिय सत्य,


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भाई साहब कि बस, कुछ न पूछिए। वहाँ न कोई आदमी न आदमजात; किसे पुकारता? जब मैं बेहोश गिर पड़ा तो तीनों वहाँ से खिसक गए।'

'भाई साहब, आदमी के भीतर क्या है, इसे ब्रह्मा भी नहीं जान सकते; हमारी-आपकी हस्ती भी क्या है। साधुओं के भेष में बहुधा दुष्ट........।'

दाननाथ ने दबी जबान से पूछा - 'भाई साहब का खयाल है कि अमृतराय......'

दाननाथ ने देखा कि अब स्पष्ट कहने के सिवाय और मार्ग नहीं है, चाहे कमलाप्रसाद नाराज ही क्यों न हो जाए। सिर नीचा करके एक अप्रिय सत्य,


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