प्रतिज्ञा - Pratigya

तब अपने घर लाया। बराबर अपनी बहन समझता रहा, जो और लोग खाते थे, वही वह भी खाती थी, जो और लोग पहनते थे, वही वह भी पहनती थी, मगर वह भी शत्रुओं से मिली हुई थी। कई दिन से कह रही थी कि जरा मुझे अपने बगीचे की सैर करा दो। आज जो उसे ले कर गया तो क्या देखता हूँ कि दो मुस्टंडे बँगले के बरामदे में खड़े हैं। मुझे देखते ही दोनों ही टूट पड़े अकेले मैं क्या करता। वह पिशाचिनी भी उन दोनों के साथ मिल गई और मुझ पर डंडों का प्रहार करने लगी। ऐसी मार पड़ी है,


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तब अपने घर लाया। बराबर अपनी बहन समझता रहा, जो और लोग खाते थे, वही वह भी खाती थी, जो और लोग पहनते थे, वही वह भी पहनती थी, मगर वह भी शत्रुओं से मिली हुई थी। कई दिन से कह रही थी कि जरा मुझे अपने बगीचे की सैर करा दो। आज जो उसे ले कर गया तो क्या देखता हूँ कि दो मुस्टंडे बँगले के बरामदे में खड़े हैं। मुझे देखते ही दोनों ही टूट पड़े अकेले मैं क्या करता। वह पिशाचिनी भी उन दोनों के साथ मिल गई और मुझ पर डंडों का प्रहार करने लगी। ऐसी मार पड़ी है,


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