प्रतिज्ञा - Pratigya



'अब यह मैं क्या जानूँ? मगर वहाँ पहुँच गई, इसमें संदेह नहीं। कई आदमी वहाँ पता लगा आए। मैं कमलाप्रसाद को देखते ही भाँप गई थी कि यह आदमी निगाह का अच्छा नहीं है, लेकिन तुम किसकी सुनते थे?'

'जिनके आँखें हैं, वह जान ही जाते हैं। हाँ, तुम जैसे आदमी धोखा खा जाते हैं। अब शहर में तुम जिधर जाओगे, उधर उँगलियाँ उठेंगी। लोग तुम्हें दोषी ठहराएँगे। वह औरत वहाँ जा कर न जाने क्या-क्या बातें बनाएगी। एक-एक बात की सौ-सौ लगाएगी। यह मैं


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'अब यह मैं क्या जानूँ? मगर वहाँ पहुँच गई, इसमें संदेह नहीं। कई आदमी वहाँ पता लगा आए। मैं कमलाप्रसाद को देखते ही भाँप गई थी कि यह आदमी निगाह का अच्छा नहीं है, लेकिन तुम किसकी सुनते थे?'

'जिनके आँखें हैं, वह जान ही जाते हैं। हाँ, तुम जैसे आदमी धोखा खा जाते हैं। अब शहर में तुम जिधर जाओगे, उधर उँगलियाँ उठेंगी। लोग तुम्हें दोषी ठहराएँगे। वह औरत वहाँ जा कर न जाने क्या-क्या बातें बनाएगी। एक-एक बात की सौ-सौ लगाएगी। यह मैं


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