प्रतिज्ञा - Pratigya

कभी न मानूँगी कि पहले से कुछ साँठ-गाँठ न थी। अगर पहले से कोई बातचीत न थी तो वह कमलाप्रसाद के साथ अकेले बगीचे में गई क्यों? मगर अब वह सारा अपराध कमलाप्रसाद के सिर रख कर आप निकल जाएगी। मुझे डर है कि कहीं तुम्हें भी न घसीटे। जरा मुझसे उसकी भेंट हो जाती, तो मैं पूछती।'

प्रेमा ने उनकी ओर देखा। उसकी आँखें लाल थीं। वह बातें, जो हृदय को मलते रहने पर उसके मुख से न निकलने पाती थी, 'कर्तव्य और शंका जिन्हें अंदर ही दबा देती थी',


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कभी न मानूँगी कि पहले से कुछ साँठ-गाँठ न थी। अगर पहले से कोई बातचीत न थी तो वह कमलाप्रसाद के साथ अकेले बगीचे में गई क्यों? मगर अब वह सारा अपराध कमलाप्रसाद के सिर रख कर आप निकल जाएगी। मुझे डर है कि कहीं तुम्हें भी न घसीटे। जरा मुझसे उसकी भेंट हो जाती, तो मैं पूछती।'

प्रेमा ने उनकी ओर देखा। उसकी आँखें लाल थीं। वह बातें, जो हृदय को मलते रहने पर उसके मुख से न निकलने पाती थी, 'कर्तव्य और शंका जिन्हें अंदर ही दबा देती थी',


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