प्रतिज्ञा - Pratigya



अमृतराय - 'अच्छा भाई, मैं ही भूल कर रहा हूँ। चलते हो कहीं? हाँ, आज तुम्हें शाम तक यहाँ रहना पड़ेगा। भोजन तैयार हो रहा है। भोजन करके जरा लेटेंगे, खूब गप-शप करेंगे, फिर शाम को दरिया में बजरे का आनंद उठाएँगे। वहाँ से लौट कर फिर भोजन करेंगे, और तब तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी। ईश्वर ने चाहा तो आज ही प्रेमा देवी मुझे कोसने लगेंगी।'


अध्याय 17

दोनों मित्र आश्रम की सैर करने चले। अमृतराय ने नदी के किनारे असी-संगम के निकट पचास


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अमृतराय - 'अच्छा भाई, मैं ही भूल कर रहा हूँ। चलते हो कहीं? हाँ, आज तुम्हें शाम तक यहाँ रहना पड़ेगा। भोजन तैयार हो रहा है। भोजन करके जरा लेटेंगे, खूब गप-शप करेंगे, फिर शाम को दरिया में बजरे का आनंद उठाएँगे। वहाँ से लौट कर फिर भोजन करेंगे, और तब तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी। ईश्वर ने चाहा तो आज ही प्रेमा देवी मुझे कोसने लगेंगी।'


अध्याय 17

दोनों मित्र आश्रम की सैर करने चले। अमृतराय ने नदी के किनारे असी-संगम के निकट पचास


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