प्रतिज्ञा - Pratigya

फिर क्यों नहीं ब्याह कर लेते। सिंगल रहने का ख्याल छोड़ो। बुढ़ापे में परलोक की फिक्र कर लेना। मैंने भी तो यही नक्शा तैयार कर लिया है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि विवाह को लोग क्यों सार्वजनिक जीवन के लिए बाधक समझते हैं। अगर ईसा, शंकर और दयानंद अविवाहित थे, तो राम, कृष्ण, शिव और विष्णु गृहस्थी के जुए में जकड़े हुए थे।'

दाननाथ ने त्योरी चढ़ा कर कहा - 'मैंने कभी अविवाहित जीवन को आदर्श नहीं समझा। वह आदर्श हो ही कैसे सकता है? अस्वाभाविक वस्तु कभी आदर्श नहीं हो सकती।'


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फिर क्यों नहीं ब्याह कर लेते। सिंगल रहने का ख्याल छोड़ो। बुढ़ापे में परलोक की फिक्र कर लेना। मैंने भी तो यही नक्शा तैयार कर लिया है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि विवाह को लोग क्यों सार्वजनिक जीवन के लिए बाधक समझते हैं। अगर ईसा, शंकर और दयानंद अविवाहित थे, तो राम, कृष्ण, शिव और विष्णु गृहस्थी के जुए में जकड़े हुए थे।'

दाननाथ ने त्योरी चढ़ा कर कहा - 'मैंने कभी अविवाहित जीवन को आदर्श नहीं समझा। वह आदर्श हो ही कैसे सकता है? अस्वाभाविक वस्तु कभी आदर्श नहीं हो सकती।'


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