प्रतिज्ञा - Pratigya

उन्हें रोकने की इच्छा होने पर भी बुला न सके।


अध्याय 3

होली का दिन आया। पंडित वसंत कुमार के लिए यह भंग पीने का दिन था। महीनों पहले से भंग मँगवा रखी थी। अपने मित्रों को भंग पीने का नेवता दे चुके थे। सवेरे उठते ही पहला काम जो उन्होंने किया, वह भंग धोना था।

सहसा बाबू कमलाप्रसाद आ पहुँचे। यह जमघट देख कर बोले - 'क्या हो रहा है? भई, हमारा हिस्सा भी है न?'

कमलाप्रसाद - 'अजी मीठी पिलाओ, नमकीन क्या? मगर यार, केसर और केवड़ा जरूर हो,


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उन्हें रोकने की इच्छा होने पर भी बुला न सके।


अध्याय 3

होली का दिन आया। पंडित वसंत कुमार के लिए यह भंग पीने का दिन था। महीनों पहले से भंग मँगवा रखी थी। अपने मित्रों को भंग पीने का नेवता दे चुके थे। सवेरे उठते ही पहला काम जो उन्होंने किया, वह भंग धोना था।

सहसा बाबू कमलाप्रसाद आ पहुँचे। यह जमघट देख कर बोले - 'क्या हो रहा है? भई, हमारा हिस्सा भी है न?'

कमलाप्रसाद - 'अजी मीठी पिलाओ, नमकीन क्या? मगर यार, केसर और केवड़ा जरूर हो,


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