प्रतिज्ञा - Pratigya

को अपने पास रखो। कौन जाने किस वक्त इनकी जरूरत पड़े। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हें अपनी बेटी समझता रहूँगा। तुम्हें कोई तकलीफ न होगी।'

षोडसी बड़ी धूम से हुई। कई सौ ब्राह्मणों ने भोजन किया। दान-दक्षिणा में भी कोई कमी न की गई।

रात के बारह बज गए थे। लाला बदरीप्रसाद ब्राह्मणों को भोजन करा के लेटे, तो देखा - प्रेमा उनके कमरे में खड़ी है। बोले - 'यहाँ क्यों खड़ी हो, बेटी - रात बहुत हो गई, जा कर सो रहो।'

प्रेमा - 'आपने अभी कुछ भोजन नहीं किया है न?'


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को अपने पास रखो। कौन जाने किस वक्त इनकी जरूरत पड़े। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हें अपनी बेटी समझता रहूँगा। तुम्हें कोई तकलीफ न होगी।'

षोडसी बड़ी धूम से हुई। कई सौ ब्राह्मणों ने भोजन किया। दान-दक्षिणा में भी कोई कमी न की गई।

रात के बारह बज गए थे। लाला बदरीप्रसाद ब्राह्मणों को भोजन करा के लेटे, तो देखा - प्रेमा उनके कमरे में खड़ी है। बोले - 'यहाँ क्यों खड़ी हो, बेटी - रात बहुत हो गई, जा कर सो रहो।'

प्रेमा - 'आपने अभी कुछ भोजन नहीं किया है न?'


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