प्रतिज्ञा - Pratigya



पूर्णा को हँसी आ गई, बोली - 'आप तो उनकी हँसी उड़ा रहे हैं भला ऐसा कौन होगा, जिसे इतनी समझ न हो।'

कमलाप्रसाद - 'इतनी समझ को तुम साधारण बात समझ रही हो, पर यह साधारण बात नहीं। तुमको यह सुन कर आश्चर्य तो होगा, पर अपनी तारीफ सुन कर हम इतने मतवाले हो जाते हैं कि फिर हममें विवेक की शक्ति ही लुप्त हो जाती है। बड़े-से-बड़ा महात्मा भी अपनी प्रशंसा सुन कर फूल उठता है। हाँ, प्रशंसा करने वाले शब्दों में भक्ति का भाव रहना आवश्यक है। यदि ऐसा न होता,


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पूर्णा को हँसी आ गई, बोली - 'आप तो उनकी हँसी उड़ा रहे हैं भला ऐसा कौन होगा, जिसे इतनी समझ न हो।'

कमलाप्रसाद - 'इतनी समझ को तुम साधारण बात समझ रही हो, पर यह साधारण बात नहीं। तुमको यह सुन कर आश्चर्य तो होगा, पर अपनी तारीफ सुन कर हम इतने मतवाले हो जाते हैं कि फिर हममें विवेक की शक्ति ही लुप्त हो जाती है। बड़े-से-बड़ा महात्मा भी अपनी प्रशंसा सुन कर फूल उठता है। हाँ, प्रशंसा करने वाले शब्दों में भक्ति का भाव रहना आवश्यक है। यदि ऐसा न होता,


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