तो कवियों को झूठी तारीफों के पुल बाँधने के लिए हमारे राजे-महाराजे पुरस्कार क्यों देते। बताओ? राजा साहब तमंचे की आवाज सुन कर चौंक पड़ते हैं, कानों में उँगली डाल लेते हैं और घर में भागते हैं, पर दरबार का कवि उन्हें वीरता में अर्जुन और द्रोणाचार्य से दो हाथ और ऊँचा उठा देता है, तो राजा साहब की मूँछें खिल उठती हैं, उन्हें एक क्षण के लिए भी यह ख्याल नहीं आता कि यह मेरी हँसी उड़ाई जा रही है। ऐसी तारीफों में हम शब्दों को नहीं,
तो कवियों को झूठी तारीफों के पुल बाँधने के लिए हमारे राजे-महाराजे पुरस्कार क्यों देते। बताओ? राजा साहब तमंचे की आवाज सुन कर चौंक पड़ते हैं, कानों में उँगली डाल लेते हैं और घर में भागते हैं, पर दरबार का कवि उन्हें वीरता में अर्जुन और द्रोणाचार्य से दो हाथ और ऊँचा उठा देता है, तो राजा साहब की मूँछें खिल उठती हैं, उन्हें एक क्षण के लिए भी यह ख्याल नहीं आता कि यह मेरी हँसी उड़ाई जा रही है। ऐसी तारीफों में हम शब्दों को नहीं,