पूर्णा ने आँसू पोंछ डाले और आवाज सँभाल कर बोली - 'यह तो तुम झूठ कहती हो बहन। यह सोचती तो तुम आती क्यों?'
पूर्णा ने कुछ आशंकित हो कर पूछा - 'तुम अब तक कैसे जाग रही हो?'
पूर्णा - 'तो क्यों सोती हो सारे दिन?'
सुमित्रा हँसने लगी। एक क्षण में सहसा उसका मुख गंभीर हो गया। बोली - 'अपने माता-पिता की धन-लिप्सा का प्रायश्चित कर रही हूँ, बहन और क्या।' यह कहते-कहते उसकी आँखें सजल हो गई।
सुमित्रा किसी अंतर्वेदना से विकल हो कर बोली - 'तुम देख लेना बहन,
पूर्णा ने आँसू पोंछ डाले और आवाज सँभाल कर बोली - 'यह तो तुम झूठ कहती हो बहन। यह सोचती तो तुम आती क्यों?'
पूर्णा ने कुछ आशंकित हो कर पूछा - 'तुम अब तक कैसे जाग रही हो?'
पूर्णा - 'तो क्यों सोती हो सारे दिन?'
सुमित्रा हँसने लगी। एक क्षण में सहसा उसका मुख गंभीर हो गया। बोली - 'अपने माता-पिता की धन-लिप्सा का प्रायश्चित कर रही हूँ, बहन और क्या।' यह कहते-कहते उसकी आँखें सजल हो गई।
सुमित्रा किसी अंतर्वेदना से विकल हो कर बोली - 'तुम देख लेना बहन,