बाद दाननाथ को वहाँ प्रतिष्ठित करने में उसे क्षोभ नहीं हुआ। उसने मन को टटोल कर देखा, तो उसे ऐसा मालूम हुआ कि वह दाननाथ से प्रेम भी कर सकती है। बदरीप्रसाद विवाह के विषय में उसकी अनुमति आवश्यक समझते थे। कितनी ही बातों में वह बहुत ही उदार थे। प्रेमा की अनुमति पाते ही उन्होंने दाननाथ के पास पैगाम भेज दिया।
अंत में बहुत सोचने-विचारने के बाद उन्होंने यही स्थिर किया कि एक बार अमृतराय को फिर टटोलना चाहिए। यदि अब भी उनका मत वह बदल सके,
बाद दाननाथ को वहाँ प्रतिष्ठित करने में उसे क्षोभ नहीं हुआ। उसने मन को टटोल कर देखा, तो उसे ऐसा मालूम हुआ कि वह दाननाथ से प्रेम भी कर सकती है। बदरीप्रसाद विवाह के विषय में उसकी अनुमति आवश्यक समझते थे। कितनी ही बातों में वह बहुत ही उदार थे। प्रेमा की अनुमति पाते ही उन्होंने दाननाथ के पास पैगाम भेज दिया।
अंत में बहुत सोचने-विचारने के बाद उन्होंने यही स्थिर किया कि एक बार अमृतराय को फिर टटोलना चाहिए। यदि अब भी उनका मत वह बदल सके,