तो उनका समस्त जीवन दुःखमय हो जाता है। वे प्रेम और कर्तव्य पर उत्सर्ग करना नहीं जानती या नहीं चाहती। हाँ, प्रेम और कर्तव्य में संयोग हो जाए, तो उनका जीवन आदर्श हो जाता है। ऐसा ही स्वभाव प्रेमा का भी जान पड़ता है। मैं दानू को लिखे देता हूँ कि मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रेमा से पूछ कर ही निश्चय कर सकूँगा।'
बदरीप्रसाद ने जरा माथा सिकोड़ कर पूछा - 'कमाने का ढंग कैसा, मैं नहीं समझा?'
बदरीप्रसाद - 'पचास ही हजार बनाए,
तो उनका समस्त जीवन दुःखमय हो जाता है। वे प्रेम और कर्तव्य पर उत्सर्ग करना नहीं जानती या नहीं चाहती। हाँ, प्रेम और कर्तव्य में संयोग हो जाए, तो उनका जीवन आदर्श हो जाता है। ऐसा ही स्वभाव प्रेमा का भी जान पड़ता है। मैं दानू को लिखे देता हूँ कि मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रेमा से पूछ कर ही निश्चय कर सकूँगा।'
बदरीप्रसाद ने जरा माथा सिकोड़ कर पूछा - 'कमाने का ढंग कैसा, मैं नहीं समझा?'
बदरीप्रसाद - 'पचास ही हजार बनाए,