प्रतिज्ञा - Pratigya

तो क्या बनाए, मैं तो समझता हूँ, एक लाख से कम पर हाथ न मारेंगे।'

बदरीप्रसाद - 'जा कर कुछ दिनों उनकी शागिर्दी करो, इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।'

बदरीप्रसाद - 'जरा भी नहीं। तुम कभी झूठ बोले ही नहीं, भला आज क्यों झूठ बोलने लगे। सत्य के अवतार तुम्हीं तो हो।'

कमलाप्रसाद - 'अच्छा, मैं ही झूठा सही, इसमें झगड़ा काहे का, थोड़े दिनों में आपकी कलई खुल जाएगी। आप जैसे सरल जीव संसार में न होते तो ऐसे धूर्तों की थैलियाँ कौन भरता?'


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तो क्या बनाए, मैं तो समझता हूँ, एक लाख से कम पर हाथ न मारेंगे।'

बदरीप्रसाद - 'जा कर कुछ दिनों उनकी शागिर्दी करो, इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।'

बदरीप्रसाद - 'जरा भी नहीं। तुम कभी झूठ बोले ही नहीं, भला आज क्यों झूठ बोलने लगे। सत्य के अवतार तुम्हीं तो हो।'

कमलाप्रसाद - 'अच्छा, मैं ही झूठा सही, इसमें झगड़ा काहे का, थोड़े दिनों में आपकी कलई खुल जाएगी। आप जैसे सरल जीव संसार में न होते तो ऐसे धूर्तों की थैलियाँ कौन भरता?'


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