प्रतिज्ञा - Pratigya

जोर से धड़कने लगा। उसने काँपते हुए हाथों से पत्र ले लिया पर कैसा रहस्य! लिखावट तो साफ अमृतराय की है। उसकी आँखें भर आईं। लिखावट पर यह लिपि देख कर एक दिन उसका हृदय कितना फूल उठता था। पर आज! वही लिपि उसकी आँखों में काँटों की भाँति चुभने लगी। एक-एक अक्षर, बिच्छू की भाँति हृदय में डंक मारने लगा। उसने पत्र निकाल कर देखा - वही लिपि थी, वही चिर-परिचित सुंदर स्पष्ट लिपि, जो मानसिक शांति की द्योतक होती है। पत्र का आशय वही था, जो


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जोर से धड़कने लगा। उसने काँपते हुए हाथों से पत्र ले लिया पर कैसा रहस्य! लिखावट तो साफ अमृतराय की है। उसकी आँखें भर आईं। लिखावट पर यह लिपि देख कर एक दिन उसका हृदय कितना फूल उठता था। पर आज! वही लिपि उसकी आँखों में काँटों की भाँति चुभने लगी। एक-एक अक्षर, बिच्छू की भाँति हृदय में डंक मारने लगा। उसने पत्र निकाल कर देखा - वही लिपि थी, वही चिर-परिचित सुंदर स्पष्ट लिपि, जो मानसिक शांति की द्योतक होती है। पत्र का आशय वही था, जो


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