प्रतिज्ञा - Pratigya

वह असीम भक्ति जो प्रेमा ने उसमें बरसों से संचित कर रखी थी, एक दीर्घ शीतल विश्वास के रूप में निकल गई। उसे ऐसा जान पड़ा मानो उसके संपूर्ण अंग शिथिल हो गए हैं, मानो हृदय भी निस्पंद हो गया है, मानो उसका अपनी वाणी पर लेशमात्र भी अधिकार नहीं है। उसके मुख, से ये शब्द निकल पड़े - 'आपकी जो इच्छा हो वह कीजिए, मुझे सब स्वीकार है। वह कहने जा रही थी - जब कुएँ में गिरना है, तो जैसे पक्का वैसे कच्चा, उसमें कोई भेद नहीं। पर जैसे किसी


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वह असीम भक्ति जो प्रेमा ने उसमें बरसों से संचित कर रखी थी, एक दीर्घ शीतल विश्वास के रूप में निकल गई। उसे ऐसा जान पड़ा मानो उसके संपूर्ण अंग शिथिल हो गए हैं, मानो हृदय भी निस्पंद हो गया है, मानो उसका अपनी वाणी पर लेशमात्र भी अधिकार नहीं है। उसके मुख, से ये शब्द निकल पड़े - 'आपकी जो इच्छा हो वह कीजिए, मुझे सब स्वीकार है। वह कहने जा रही थी - जब कुएँ में गिरना है, तो जैसे पक्का वैसे कच्चा, उसमें कोई भेद नहीं। पर जैसे किसी


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