अवध की यह उदारता हतबलता का परिचायक नहीं थी। मई की 31 तारीख से जून का पहला हफ्ता समाप्त होते-न-होते सारा अवध प्रांत एक धड़ाके से विद्रोह कर उठा। उस अवध पद्रेश के अनेक जमींदार राजा अंगे्रजी सŸाा के अधीन थे। वे हजारों सिपाही, पैदल, घु़ड़सवार, तोपखाना, सरकारी और अन्य विभागों के सारे नौकर, किसान, व्यापारी एवं विद्यार्थी, हिंदू या मुसलमान, हाथ में हाथ थामे एक ही भूमि के दास्य विमोचन हेतु तलवार खींचकर उठ खड़े हुए। निजी वैर,
अवध की यह उदारता हतबलता का परिचायक नहीं थी। मई की 31 तारीख से जून का पहला हफ्ता समाप्त होते-न-होते सारा अवध प्रांत एक धड़ाके से विद्रोह कर उठा। उस अवध पद्रेश के अनेक जमींदार राजा अंगे्रजी सŸाा के अधीन थे। वे हजारों सिपाही, पैदल, घु़ड़सवार, तोपखाना, सरकारी और अन्य विभागों के सारे नौकर, किसान, व्यापारी एवं विद्यार्थी, हिंदू या मुसलमान, हाथ में हाथ थामे एक ही भूमि के दास्य विमोचन हेतु तलवार खींचकर उठ खड़े हुए। निजी वैर,