यह ठीक नहीं है। धूम से तिलमिलाती यह औरत सामने है। उससे बात करना चालू करें। आओ। एक नौकर इसीलिए उससे पूछता है-‘‘क्यों मेम साहब, तुम्हें यहां की धूप कितनी अच्छी लगती है? अब तो खूब जलन हो रही है न? तुम अपने ठंडे देश में रही होती तो इस देश की धूप में क्यों जलना पड़ता?’’ इस महिला को आंखें
1857 का स्वातंत्र्य समर - 219
मटकाते हुए व्यंग्य भरा, कमअपसपेी उपदेश देकर अब दूसरी महिला! देखें, उसे यह क्या कहती
यह ठीक नहीं है। धूम से तिलमिलाती यह औरत सामने है। उससे बात करना चालू करें। आओ। एक नौकर इसीलिए उससे पूछता है-‘‘क्यों मेम साहब, तुम्हें यहां की धूप कितनी अच्छी लगती है? अब तो खूब जलन हो रही है न? तुम अपने ठंडे देश में रही होती तो इस देश की धूप में क्यों जलना पड़ता?’’ इस महिला को आंखें
1857 का स्वातंत्र्य समर - 219
मटकाते हुए व्यंग्य भरा, कमअपसपेी उपदेश देकर अब दूसरी महिला! देखें, उसे यह क्या कहती