योग्य न हो तो उस नींव पर निर्मित मकान ताश के तंबू से अधिक भव्य या विशाल कभी भी नहीं माना जा सकता, यह बात अशिक्षित-गंवार भी जानता है। परंतु किसी सामान्य मनुष्य को भी ज्ञात यह व्यवहारज्ञान भुलाकर जब कोई लेखक प्रचंड क्रांति मंदिर किसी घास के तिनके पर निर्मित था-तो या तो वह पागल होता है या फिर क्षुद्र प्राणी। वह इन दोनों विशेषणों में से किसी एक का भी पात्र हो तो इतिहास-लेखन के पवित्र कार्य के लिए पूरी तरह अयोग्य है।
योग्य न हो तो उस नींव पर निर्मित मकान ताश के तंबू से अधिक भव्य या विशाल कभी भी नहीं माना जा सकता, यह बात अशिक्षित-गंवार भी जानता है। परंतु किसी सामान्य मनुष्य को भी ज्ञात यह व्यवहारज्ञान भुलाकर जब कोई लेखक प्रचंड क्रांति मंदिर किसी घास के तिनके पर निर्मित था-तो या तो वह पागल होता है या फिर क्षुद्र प्राणी। वह इन दोनों विशेषणों में से किसी एक का भी पात्र हो तो इतिहास-लेखन के पवित्र कार्य के लिए पूरी तरह अयोग्य है।