मुंह पर लज्जा की छाया आ जाती है। विद्रोहियों के नाम का उल्लेख उनके शत्रुओं को ही नहीं, पगले अनजानों को ही नहीं-जिसके लिए उन विद्रोहियों ने रक्त बहाया, उन अपनों को भी त्याज्य लगता है, निद्य लगता है, पापकारक लगता है। उनके शत्रु उन्हें राक्षस, पिशाच, रक्तप्रिय, नरक के कीड़े कहते हैं। उनके अनजाने उन्हें अमानुष, जंगली, अघोरी कहते हैं और जिन्हें देशबंधु अपना कहने से भी
1857 का स्वातंत्र्य समर - 225
कतराते
मुंह पर लज्जा की छाया आ जाती है। विद्रोहियों के नाम का उल्लेख उनके शत्रुओं को ही नहीं, पगले अनजानों को ही नहीं-जिसके लिए उन विद्रोहियों ने रक्त बहाया, उन अपनों को भी त्याज्य लगता है, निद्य लगता है, पापकारक लगता है। उनके शत्रु उन्हें राक्षस, पिशाच, रक्तप्रिय, नरक के कीड़े कहते हैं। उनके अनजाने उन्हें अमानुष, जंगली, अघोरी कहते हैं और जिन्हें देशबंधु अपना कहने से भी
1857 का स्वातंत्र्य समर - 225
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