हिंदुस्थान के हृदय में भड़क उठी थी। उनके सिंहासन फूटे हुए, उनके मुकुट टूटे हुए, उनका देश छीना हुआ, उनका धर्म कुचला हुआ, मानभंग, जीवन में विफलता का पहाड़, निवेदन व्यर्थ, अर्जिया व्यर्थ, रोना बेकार, चिल्लाना व्यर्थ। तब प्रकृति की प्रतिक्रिया शुरू हुई और जहां-तहां ‘प्रतिशोध, बदला’, ऐसी कानाफूसी होने लगी। ऊपर वर्णित एक-एक घटना प्रतिशोध को जन्म देती है, पर यहां तो ऐसी अनंत घटनाएं घटित हुई। इतने पर भी विद्रोह न होता तो हिंदुस्थान मरा हुआ है,
हिंदुस्थान के हृदय में भड़क उठी थी। उनके सिंहासन फूटे हुए, उनके मुकुट टूटे हुए, उनका देश छीना हुआ, उनका धर्म कुचला हुआ, मानभंग, जीवन में विफलता का पहाड़, निवेदन व्यर्थ, अर्जिया व्यर्थ, रोना बेकार, चिल्लाना व्यर्थ। तब प्रकृति की प्रतिक्रिया शुरू हुई और जहां-तहां ‘प्रतिशोध, बदला’, ऐसी कानाफूसी होने लगी। ऊपर वर्णित एक-एक घटना प्रतिशोध को जन्म देती है, पर यहां तो ऐसी अनंत घटनाएं घटित हुई। इतने पर भी विद्रोह न होता तो हिंदुस्थान मरा हुआ है,