1857 का स्वातंत्र्य समर - 1857 Ka Svatantrya Samar




1857 का स्वातंत्र्य समर - 227

रहने दें, पर हिंदुस्थान तब अत्याचार की ज्वाला से जला हुआ था और सरेआम मार-काट को जिस एक परिस्थिति में न्याय दंड का स्वरूप मिल जाता है उस दुर्जन पीड़ाग्रस्तता की हिंदुस्थान पर असह्य मार पड़ी थी। परंतु क्राॅमवेल जब आयरलैंड में सेना लेकर घुसा और जब वहां के लोगेां के यथार्थ देशाभिमान से वह अधिक ही क्रुद हो गया और वहां के लड़ाकुओं पर ही नहीं, अशरण गरीबों पर उसकी तलवपर सरसराती पड़ी,


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1857 का स्वातंत्र्य समर - 227

रहने दें, पर हिंदुस्थान तब अत्याचार की ज्वाला से जला हुआ था और सरेआम मार-काट को जिस एक परिस्थिति में न्याय दंड का स्वरूप मिल जाता है उस दुर्जन पीड़ाग्रस्तता की हिंदुस्थान पर असह्य मार पड़ी थी। परंतु क्राॅमवेल जब आयरलैंड में सेना लेकर घुसा और जब वहां के लोगेां के यथार्थ देशाभिमान से वह अधिक ही क्रुद हो गया और वहां के लड़ाकुओं पर ही नहीं, अशरण गरीबों पर उसकी तलवपर सरसराती पड़ी,


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