रूप में वह राज्यारोहण था। क्योंकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों, नागरिकों और सेना ने एकमत होकर बहादुरशाह को इस समय बादशाही तख्त पर आरूढ़ किया था, और स्वतंत्रता समर का नेतृत्व भी उसी को दिया था, इसलिए 11 मई को दिल्ली के सिंहासन पर बहादुरशाह ने जो आरोहण किया था वह प्राचीन मुगल परंपरा के अकबर या औरंगजेब की तरह का आरोहण नहीं था। क्योंकि वह मुगलिया तख्ता वीर मराठे बहादुरों ने घन की चोटों से कभी का छिन्न-विच्छिन्न
रूप में वह राज्यारोहण था। क्योंकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों, नागरिकों और सेना ने एकमत होकर बहादुरशाह को इस समय बादशाही तख्त पर आरूढ़ किया था, और स्वतंत्रता समर का नेतृत्व भी उसी को दिया था, इसलिए 11 मई को दिल्ली के सिंहासन पर बहादुरशाह ने जो आरोहण किया था वह प्राचीन मुगल परंपरा के अकबर या औरंगजेब की तरह का आरोहण नहीं था। क्योंकि वह मुगलिया तख्ता वीर मराठे बहादुरों ने घन की चोटों से कभी का छिन्न-विच्छिन्न